Monika garg

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लेखनी प्रतियोगिता -24-Mar-2022 #उडडीका(यादें)

कुछ यादें ऐसी होती है जो हमारे घर आंगन से जुड़ी होती है ऐसी ही एक याद मेरे मायके के आंगन से जुड़ी है जो मै जब भी मायके जाती हूं तो वो याद ताजा हो जाती है जो कहानी के रूप मे यहां प्रस्तुत है 


यादें ऐसी होती है जो भुलाये नहीं भूलती। ऐसी ही याद मनु के बचपन की है। मनु अपने परिवार में सब से छोटी थी। चार बहने और एक भाई। पिता के पास आय के साधन कम थे। परिवार बड़ा था आमदनी कम मुश्किल से ही गुजर बसर होती थी। सारा दिन माँ इसी चिंता में घुलती रहती थी कि भगवान बेटियाँ तो इतनी दे दी ।बस अब इन के हाथ पीले हो जाये तो गंगा नहायी जाये।मनु बचपन से ही चंचल स्वभाव की थी उनकी गली मे एक बुजुर्ग महिला रहती थी। नाम था "जैरो "मनु जब भी  गली से गुजरती हर बार सोचती  कि जैरो भी क्या नाम हुआ। वैसे उसे सब मासी कह कर बुलाते थे। एक दिन मनु अपने आंगन मे बैठी थी उस ने बगल में से जाती हुई जैरो मासी को आवाज़ लगाई और अपने पास बुलाया। "मासी आओ ना कुछ टाइम हमारे पास बैठो "मनु के मन में तो कोतुहल था की  कैसे पता लगे की मासी का नाम जैरो कैसे पड़ा। उस ने कुरेदते हुए पूछा "मासी जरा ये तो बताओ की आप का नाम जैरो कैसे पड़ा। इतने में जैरो मासी खिलखला कर हंस पड़ी। आगे का एक दाँत होठो पर आ कर रुक गया। औसत कद की अस्सी बयासी साल कि बूढी थी वो। मुँह पर  झुर्रियां  पड़ी हुई थी। अचानक जब बच्चो ने उस से उसके अतीत के विषय में पूछा तो वो अपनी पुरानी यादो में खो गई। "सुण नी कुड़िये !मेरा ना जैरो क्यू पड़ा तेनु दस्सदी हा। मेरी माँ दी मैं पंजवी  कुड़ी  सी  जदो मै होइ सी ता मेरा मामा गुजर गया  । इक ता पंजवी  कुड़ी  दूजे इको  परहा  सी मेरी बीजी  दा ओ भी  गुजर गया। मेरी माँ नू मैं जहर वारगी लग्गन लगि सी इसी वास्ते मेरा ना जैरो रख दिया मेरी बीजी  ने। इतना कहते ही वो खिलखिला पड़ी।  जैसे बहुत बड़ी उपाधि दीं गई हो।  मनु को उस की बाते सुनने में मजा आ रहा था। उस ने कहा "मासी अपने बचपन के  बारे में और कुछ बताओ।
            मासी एक बार फिर अपनी यादो में खो गई "बचपन की था धीये इक किस्म दी जेल सी। कुड़िआ नू बहर निकलन दा हुकम कोई ना  था। मेनू याद है मै अपने लाला जी दे आगे सर ढक के जांदे सी। अज काल दीं कुड़िया वारगी नहीं जेडी हाय पापा मै जा रही हूँ। कह के छोटी छोटी फराका   जिया पा के टूर दी फिरदी हान। मेरे तो छोटे चार भरा सी और मेरी  पाहणा दा ते वयहा {शादी }हो गया  सी  मै सारा दिन घर दा काम कर दी बाद विच  अपने भाइया नू खिड़ांदी। हम लाहौर दे नाल सोल्लासी रहन्दे सी जदो भारत पाकिस्तान दी लड़इया होइ सी  मै बाहरा साल दी सी। मेनू याद है इक रात बड़ा शोरशराबा होया सी। ओनु मारो ओनु कटो। मुसलमान कहन्दे इक वी हिंदू नहीं बचना चाहिए। ते हिंदू कहन्दे इक वी मुसलमान नहीं बचना चाहिए। सानू  ता ना मुस्लमान द पता सी न हिंदू दा। बस भगो भगो यही आवाज आ रही सी। मेरे लाला जी साणु ल के शिविर विचो आ गए। नी कुड़िये तेनु पत्ता सी मेरा विहा मेरे लाला जी ने शिविर विच पक्का कर दिता |  ओथे ऐक और परिवार  आया सी उँहा दा इक मुंडा  सी उस दे नाल रिश्ता पक्का कर दित्ता होर सुन मेरा वियाह सवा रूपये नाल होया सी। "यह कहती हुई जैरो मासी हंसी और उठ कर चल दी।      मनु सोचती रह गई कि काश !ऐसा अब हो  जाता जैसे पहले किसी की लड़की को अपनी इज़्ज़त समझ कर बिना दान दहेज़ के अपने घर की बहु बना लेते थे। माँ बाप को कोई चिन्ता नहीं होती थी। उस के माँ बाप को भी चिन्ता ना होती इतनी बेटियाँ होने पर.................................


                                                       काश !ऐसा हो

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16 Comments

Shrishti pandey

25-Mar-2022 08:59 PM

Very nice

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Monika garg

26-Mar-2022 08:41 AM

धन्यवाद

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Fareha Sameen

25-Mar-2022 07:41 PM

Nice

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Monika garg

25-Mar-2022 08:19 PM

धन्यवाद

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Abhinav ji

25-Mar-2022 08:32 AM

Very nice mam

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Monika garg

25-Mar-2022 11:08 AM

धन्यवाद

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